बसेड़ा की डायरी-10 (जगदीश जी माड़साब)

बसेड़ा की डायरी-10   (जगदीश जी माड़साब) आज परिचय करवा रहा हूँ हमारे स्कूल के लगभग सबसे बुज़ुर्ग जगदीश जी सर से। बाकी दिल और दिमाग से...

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब,
आपको उन बच्चों के माता-पिता की तरफ से नमस्ते जो सिर्फ आपके विद्यालय के लिए ही जन्में हैं। हम वो अभिभावक हैं जिन्हें सिर्फ ये मालुम है की उनकी संतानें वो नहीं करेगी जो वे खुद जीवनभर करते रहे। इतना समझ लें कि आगे के रास्ते ढूँढने के लिए ही बच्चे आपके आसरे हैं हमारी यह साझी चिट्ठी है जो गांवभर की तरफ से एक यथार्थ बयान समझी जाए तो बेहतर होगा। पूरे गाँव की तरफ से मैं लिख रहा हूँ। इसलिए लिख पा रहा हूँ क्योंकि हमारे वक़्त के सारे माड़साब कामचोर थे। उनके ज़माने के सारे बच्चे आज मजदूरी में खप रहे हैं। एक भी नौकरी न लग पाया। मैं एक अंधों में काणा राजा की मानिंद हूँ। हाँ याद आया वे मास्टर हमसे गाँव से खाटी छाछ और खेत से लहसून, ककड़ी, प्याज और भुट्टे मंगवाने में रह गए और हम लाचार और भोले लाने में रह गए। लेनदेन से गुस्सा नहीं हैं अफ़सोस इस बात का कि वे उसके बाद भी हमें बदले में कुछ न दे पाए। हाँ तो मैं कह रहा था कि ये स्कूल भले सरकारी है मगर इसे खाली सरकारी मत समझना और बाक़ी ज़रूरतों के लिए हमें टटोलते रहिएगा। हमें खुशी ही होगी। हम खुद वंचित और पीड़ित तबके के लोग हैं जिनकी संताने आज आपके सुपुर्द हैं। हम बहुत असभ्य लोग हैं। हमारी भीतर सभ्यता के तमाम गुण रोपने और उन्हें सींचने का सलीका अगर किसी के पास है तो वो आपके पास हैं माड़साब 

लोग कहते हैं ये स्कूली बच्चे देश का बहुत बड़ा हिस्सा है और युवा हैं मतलब देश के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी। सच बताना सर जी क्या आपको भी ऐसा ही लगता है? आशा है आप भी इन बच्चों को मीड डे खाने के लिए आने वाली पीढ़ी नहीं समझते होंगे। आस तो यह भी पाल रखी है कि बाकी समाज की तरह आपके द्वारा दलित और जातिगत शब्दों से इन्हें जलील नहीं किया जाता होगा। हमें मालुम है आप भी उसी दोगले मानसिकता वाले समाज से आते हैं जो अपनी मानसिक बीमारी के कारण दबे और लगभग वंचित तबके के बच्चों के साथ एक अलग तरह के माइंड सेट के साथ पेश आता है। मगर हम इस दौर में आपसे अच्छे की कामना करते हैं। आश्वस्त हैं कि आप अलग मिसाल कायम करेंगे। आप एक बार अपनी ताकत और जिम्मे का अहसास कर लीजिएगा, सच बता रहे हैं आपको आगे बढ़ने से ये कम-संसाधनयुक्त परिवेश रोक नहीं सकेगा। सुविधाओं के मामले में प्राइवेट और सरकारी की तुलना का रोना रोते रहेंगे तो आप भी कुछ नहीं कर पाएंगे। हम जानते हैं आप में बहुत योग्यता है मगर आप अपना समय सही जगह नहीं लगा पा रहे हैं। अभी भी गंगा में उतना पानी नहीं बहा है जितना आप समझकर हारे हुए की-सी शक्ल लिए बैठे हैं

आप खुद ही समझदार हैं। सोचिएगा तो पाएंगे कि आपको रोज़ाना मिलने वाली सेलेरी और आपके रोज़ के काम का आंकलन आपको शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर कर देगा। हमें अभी भी देश के संविधान की गरिमा का बोध और उसे संभालने का जिम्मा आप में एक भरोसे की तरह नज़र आता है। गुरु जी क्या हम सही सोच रहे हैं? ये वो बच्चे हैं जो आपके लिए सुविधा नहीं चैलेंज है। आपके आलसी रवैया से ये बच्चे भी प्राइवेट की तरफ उड़ चले तो फिर हमें मत कहिएगा। गाँव में रैली निकालते रहिएगा फिर कोई साथ नहीं देने वाला। दीवारों पर चिपकाए प्रवेशोत्सव के पोस्टर गाएं खा जाएँगी। खम्भों पर लटकाए बेनर्स लोग काट ले जाएंगे और उन पर पापड़ सुखाएंगे। गाँव में कोई शादी-ब्याव के नुते देने नहीं आयेगा। 'सब पढ़े और सब बढ़े' के नारे हवा में हिचकोले खाते अनुभव होंगे तब मत कहिएगा। सरकार एक दिन परेशान होकर सबकुछ निजी हाथों में दे देगी। आपको सरकार के बजाय सेठ जी की नौकरी करनी होगी। सोचिएगा वो दिन कितना भयावह होगा

यह बच्चे आपके लिए प्रयोगशाला की एक सामग्री हैं। घबराएं नहीं बेहिचक प्रयोग करें और रिजल्ट दें। प्रतिभावान को पढ़ाना और मेरिट सरीखे बनाकर होर्डिंग पर उनके फोटो चिपकाने जैसे आसान काम तो प्राइवेट स्कूलों के मास्टरों के जिम्मे हैं। हम कुछ ही कक्षा पढ़े हैं मगर इतना तो जानते ही हैं कि आपका काम समाज की गैर-बराबरी को दूर करना है। अपनी अहम् जिम्मेदारी से भागिएगा नहीं प्लीज, नहीं तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। हिंदी के कवि चंद्रकांत देवताले जी की कविता आपने सुनी और पढ़ी होगी 'कुछ बच्चे और बाक़ी बच्चे'। आपके आसपास जो हैं ये बाक़ी के बच्चे हैं जो असल में बचे हुए की जमात हैं। इन्हें इस मुश्किल समय में हर धर्म और वर्ग को समानता की नज़र से देखते, समझते हुए हमारी सामासिक संस्कृति की समझ देना आपकी जिम्मेदारी है। आशा है आप अपने खुद के धर्म के अलावा भी ज्ञान रखते हुए पूरी सद्भावना के साथ इन बच्चों को हिन्दुस्तान की एक पूरी पिक्चर दिखाएंगे। बच्चे दिवाली के साथ ईद और क्रिसमस भी समझा सके ये आपका काम है। गुड फ्राइडे के साथ गुरु नानक जयंती को थाह सके ये भी आपके काम की फेहरिश्त का हिस्सा है। जनवरी-फरवरी की अंग्रेज़ी संस्कृति के साथ अमावस-पूनम का लोक भी बच्चे समझना चाहते हैं मगर वे आपकी तरफ देख रहे हैं। आप उन्हें अपने बच्चों की तरह समझाएंगे ना? बच्चे 'ईदगाह' और 'गौरा' जैसे पाठ पढ़ते समय आपके समग्र ज्ञान और अनुभव की बाट जोहते हैं। उन्हें इस महादेश में विद्यमान विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों की विविधता का गहराई से स्वाद देना आपका सबसे बड़ा जिम्मा है। बस इतना भर कर दीजिएगा बाकी राह ये खुद ढूंढ लेंगे

शायद आप इन बचे हुए बच्चों के बेकग्राउंड के बारे में परिचित होंगे वो यह कि इनके घरों में अमूमन माँ-पिताजी अनपढ़ हैं, किसान हैं, नरेगा मजदूर हैं, कोई किराना व्यापारी है और कोई साइकिल का पंचर बनाते हैं, कुल्फियां बेचते हैं, मकान बनाते कारीगर हैं, कोई ट्रेक्टर चलाता है तो कोई चुनाई करता है। कोई मंदिर के बाहर फूल-माला बेचकर ज़िन्दगी ठेल रहा है तो कोई कुरते-पायजामे सिलकर जी रहा है बस। किसी की माँ नहीं है तो किसी के पिताजी बचपन में गुँजर गए। किसी का भाई पागल है। किसी का मामा या नाना शराब पीकर घर में उत्पात मचाता है। कोई बकरियां चराता और पेट पालता है। किसी के अभिभावक एकदम बूढा गए हैं। किसी के पास वक़्त बहुत कम है। कोई पहले से बाल विवाह का शिकार हो चुका है। कोई आपके तम्बाकू निषेध वाले पोस्टर पढने से पहले से ही तम्बाकू सेवन करता है। स्थितियां बड़ी भयावह है गुरूजी वे पहले से ही अपने संघर्षमयी जीवन में भरसक परेशान हैं और अब आपकी संगत में एक आस लिए आराम की तलाश में आए हैं। उन्हें इस कोहरे से बाहर निकलाना है। आप अब तो समझ ही गए होंगे आपके पास कितना बड़ा काम है। बनिए की तरह हर काम को सेलेरी या बोनस से मत तोलिएगा। यह राष्ट्र धर्म है जो आपको बुला रहा है। इधर, इधर यहाँ से जहां मासूम बच्चे देर से आपको ताक रहे हैं और आप हैं कि सातवे वेतन आयोग के जोड़-घटाव में आधा कालांश स्वा-हा कर चुके हैं। मैं सबकुछ दिल से लिख रहा हूँ। दिमाग से कहता तो शुरू में ही लिखा देता कि आपकी सेलेरी का पैसा मेरे टेक्स देने से आता है। सभी के गिर जाने के समय में हम किसान-मजदूर अभी बचे हुए हैं और आपसे उम्मीद है कि आप भी अपने पद की गरिमा से और निचे नहीं गिरेंगे। सरकार मेरे कर से चलती है। मगर मैं जानता हूँ यह मेरी पहली चिट्ठी है। शुरुआत में ही इतना तल्ख़ होना अभी से अच्छा नहीं। हालांकि बहुत सा तीखा लिखा है मगर क्या करें। मेरे पास दो ही रास्ते थे या तो मैं दिल बहलाने वाली 'गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु' टाइप चिट्ठी लिख देता या फिर सच को सच की तरह कहती एक आग उगलती चिठ्ठी

हाँ तो ये वो बच्चे हैं जो खेत पर जाने से बच गए। जिनके घरों में पढ़ने के लिए अलग से कमरा तो दूर एक टेबल तक नहीं है। लाइट कभी कभार आती है। बच्चियां एक समय का चुल्हा चौका करती है। पानी भरती है और बर्तन मांजती है। दस-दस मिल से दूर से केसरिया साइकिल चलाकर आती हैं बच्चियां। उनकी आँखों में आस है। बस्ते में कोपियाँ हैं, किताबें हैं, पेन्सिल, रबर, पेन सबकुछ हैं। बारीश में रास्ते में दो से तीन नाले पड़ते हैं। पूरा जोखिम मोल लेती है साहेब। बड़ी जुगत से स्कूल आती है उस पर आप उन्हें बिना पढ़ाए घर भेज देते हैं। क्या यह झूठ है? सच बताइएगा। काश यह झूठ साबित हो जाए कई मर्तबा आप उन्हें झिड़क देते हैं, आपसी और इधर-उधर की गपशप पर टाइम पास करके चले जाते हैं। कक्षा में टेबल पर टांग रखकर अखबारी पन्ने पलटने में वक़्त बिता देते हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया। पीरियड का घंटा बच्चे तो सुनते हैं मगर आप क्यों नहीं? वक़्त बीत रहा है गुरु जी आपको भी कहीं तो जवाब देना ही होगा

ये वो बच्चे हैं जिन्हें पता नहीं कि टिफिन बॉक्स कैसे बंद होता और खुलता है। नेलकटर किस चिड़ियाँ का नाम है उनकी समझ के बाहर का विषय है। कंप्यूटर को बहुत दूर से देखा है साहेब। उनकी आँखों में कभी आराम से देखिएगा वे आपसे बहुत कुछ चाहते हैं। वक़्त निकालेंगे ना गुरूजी ? हाँ याद आया यही वो पीढ़ी है जिनके टीकाकरण का कार्ड कहीं घूम गया है। ये ही वो बच्चे हैं जो शादी के ब्याह के जीमने में स्कूल की ड्रेस भी बड़े शान और भोलेपन में पहनकर चले ही जाते हैं। ये वो बच्चे भी हैं जिन्हें जातिगत आधार पर मिलने वाली स्कोलरशिप के नाम पर कभी कभार आप अजाने में ही सार्वजनिक रूप से शर्मशार कर देते हो। ये बच्चे होमवर्क करते हुए ज्यूस नहीं पीते जनाब। इनके माँ रात में इनके दिमाग की तेज़ी के लिए दस बादाम नहीं गलाती। पेरेंट्स मीटिंग के लिए इनके माँ-पिताजी के पास वक़्त होता तो ये आपकी शागिर्दी में न होते। असल में ये बच्चे आपके ही भरोसे हैं। अगर आप इन्हें धर्म, वर्ग और जाति की संकीर्णता से बाहर आकर देखोगे तो सही से समझ पाओगे। बड़ा अफ़सोस है कि विद्या के मंदिरों में भी बच्चे अध्यापकों की तरफ से इन संकीर्णताओं के शिकार हैं। मैं आपके जवाबी चिठ्ठी का इंतज़ार करूंगा। आप मेरी धारणाएं तोड़ सके तो आपसे ज्यादा खुशी मुझे होगी। आखिर में कुछ और कहना है कि इन बच्चों की तुलना किसी से मत करिएगा क्योंकि ये अपनी तरह के बिरले बच्चे हैं। इनका देश, काल और समय एकदम अलग हैं। इसे सरल भाषा में यूं समझिएगा कि आंकड़ों की बदौलत विकसित होते इंडिया में ये एक अलग भारत है। इनके हालात अलग हैं। इन्हें आगे ले जाने आपका दायित्व भी है और आपके लिए अहम् चैलेंज भी। आशा है आप इस चैलेंज को स्वीकार करोगे। जल्दी ही मैं आपको अगली चिट्ठी लिखूंगा और स्कूल मिलने भी आउंगा। जिम्मेदारियों से हम भाग भी नहीं रहे हैं। हम साथ ही खड़े हैं। लीडर आपको बनाना पडेगा। हम असल में कम अक्ल इंसान हैं। कम लिखा है ज्यादा समझना। मैं आपके 'माड़साब' से 'गुरु' हो जाने की कामना करता हूँ

बसेड़ा के बच्चों में से किसी एक का पिता
(बसेड़ा की डायरी, 20 जुलाई 2017)

रविवार, 16 जुलाई 2017

बसेड़ा के बच्चे अब पढ़ेंगे महान लोगों की आत्मकथाएँ

बसेड़ा के बच्चे अब पढ़ेंगे महान लोगों की आत्मकथाएँ

प्रतापगढ़ जिले की छोटी सादड़ी तहसील में स्थित राजकीय आदर्श उमावि बसेड़ा में चौदह जुलाई का दिन हिंदी क्लब गठन के नाम रहा। देहाती इलाके में इस तरह की साहित्यिक गतिविधि को लेकर स्कूल और विद्यार्थियों में बहुत उत्साह है। स्कूल के कार्यवाहक प्रधानाचार्य प्रभु दयाल कुड़ी के निर्देशन और हिंदी व्याख्याता माणिक के संयोजन में पच्चीस विद्यार्थियों का एक समूह बनाया गया है जिसमें साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं सहित स्कूल में उपहार के रूप में प्राप्त पुस्तकों का समन्वयन छात्र चेनराम मीणा देखेगा। गठन के बाद सबसे पहले हिंदी साहित्य पढ़ने वाले पच्चीस छात्रों को प्रतिनिधि कहानीकारों के कहानी संग्रह दिए गए ताकि पाठकीयता विकसित हो सके। इस मौके पर ज़िला कलेक्टर अजमेर गौरव गोयल और अजमेर नगर निगम सहायक आयुक्त ज्योति काकवानी की मदद से अजमेर में संचालित बुक बैंक की तरफ से बसेड़ा के बच्चों को उपहार में मिली दो दर्जन आत्मकथाएं भी बाँटी गयी। इस तरह अब बसेड़ा के बच्चे महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, बैंजामिन फ्रैंकलिन, एपीजे अब्दुल कलाम, हेलन किलर की आत्मकथाओं सहित प्रेक प्रसंग संग्रह पढ़ेंगे। 

वरिष्ठ अध्यापक बी एल मीणा ने बताया कि लाभान्वितों में बीते वर्ष सर्वाधिक अंक हासिल करने वाले, सबसे स्वच्छ बालक-बालिका, विद्यालयी दैनिक गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाले छात्र जैसे दीपिका आँजना, एकिन मेघवाल, सोना सुथार, पवन आँजना, बबली धोबी, पुष्कर आँजना, दीपक धोबी, अर्जुन मेघवाल, कारू लाल आँजना, पंकज मीणा, नितेश भील, निकिता मेघवाल, रानू मीणा, किशन भील, चर्चिता तिवारी, अल्का लौहार, टमा सेन, आतीश मीणा शामिल थे।

अध्यापक कैलाश माली और मथुरा लाल रेगर के निर्देशन में इस अवसर पर प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों में साहित्य के प्रति रूचि जगाने के लिए चम्पक, बाल भारती, नंदन, चकमक, लोटपोट जैसी कई बाल पत्रिकाओं का भी वितरण किया गया। समारोह का संचालन इतिहास के व्याख्याता प्रेमा राम कुमावात और अध्यापक जगदीश सेंगर ने किया। अंत में आभार अध्यापक रमन गेहलोत ने व्यक्त किया।

बसेड़ा की डायरी,14 जुलाई, 2017

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

बसेड़ा के हिंदी वाले माड़साब से बच के रहना

अपील:बसेड़ा के हिंदी वाले माड़साब से बच के रहना

नमस्कार,बसेड़ा में हिंदी के नए माड़साब आए। आए तो कोई बात नहीं मगर रोज़ ही स्कूल आ जाते हैं। सप्ताह में एक दो दिन तो गोताखोर अवकाश लेना चाहिए था ना उन्हें। ये बिलकुल अच्छी बात नहीं है हाँ कह देते हैं। कक्षा में आते हैं मगर सीधे किताब पढ़ाने लग जाते हैं, अरे कभी कक्षा में अखबार ही पढ़ लेते और कुछ देर मोबाइल पर फेसबुक और वाट्स एप कर लेते तो माड़साब-जात पर कायम हमारा अटूट विश्वास तो नहीं टूटता। खाली पीरियड में भी खाली नहीं छोड़ते हैं, आ टपकते हैं हिंदी वाले माड़साब।  एकदम नवरे हैं। कभी कक्षा और स्कूल को अपना घर कहते हैं और हमसे स्कूल को घर जैसा समझने का दबाव डालते हैं। समय पर आ टपकते हैं। बारिश तक का बहाना बनाना नहीं आता उन्हें। कुछ सटके हुए लगते हैं हिंदी वाले नए माड़साब। प्रार्थना में हमारे साथ ही योग करने ज़मीन पर बिछी जाजम पर बैठ जाते हैं। पूरे नाटकबाज हैं। कभी अपने मोबाइल से तानपुरा बजाकर ध्यान करवाते हैं। इतने प्रयोग किसी अध्यापक को शोभा नहीं देते हैं। लीक से हटकर भी किसी गुरु को चलना चाहिए भला? राम राम। घोर अलोकतांत्रिक माहौल। बच्चे जाएं तो कहाँ ? योग करते हुए अनुलोम हो या विलोम, सब हमारे देखा देखी खुद भी करते हैं। असल में खुरापाती हैं, कुछ न कुछ सोचते विचारते रहते हैं। मौक़ा देखते हैं और अपना विचार हमारे मानस पर चपेक देते हैं।

सांवले से हैं और शक्ल अच्छी है। एक दिन छोड़कर दाढ़ी बनाते हैं और हाँ फेरन लवली नहीं लगाते हैं। सादे कपड़े पहनकर आते हैं। प्रार्थना सत्र में अखबार पढ़ते बच्चों को बीच में ही टोकते हुए उनका उच्चारण ठीक करवाकर ही दम लेते हैं। जिददी कह लीजिएगा।कभी कभार एकाएक इतना जनरल नॉलेज उंडेल देते हैं कि क्या कहें। बड़े निर्दयी और नए टाइप के हैं। उन्हें एकाएक समझना मुश्किल काम है। कहीं से भी माड़साब नहीं लगते हैं। हर इलाके का नॉलेज रखते हैं। धाराप्रवाह बोलते हैं। कहते हैं पहले आकाशवाणी में दस साल तक बोले, अब वक़्त नहीं मिलता उन्हें। आकाशवाणी की कसर अब हम पर निकालते हैं। हम मूंह फाड़े उन्हें सुनते रहते हैं। क्या गज़ब का बोलते हैं। पहले वालों की तरह अटकना और हकलाना तक भी नहीं आता उन्हें। पढ़ाते वक़्त पासबुक के हाथ नहीं लगाते। हिंदी जैसे विषय में भी श्यामपट्ट काम में लेते हैं। भोले कहीं के। जाने कहाँ कहाँ से नयी-पुरानी तरह तरह की किताबें मांगकर लाते हैं और चुन चुनकर हम में से ही किसी को जबरन पकड़ा देते हैं। एक तो सिलेबस को ही हम थाम नहीं पाते ऊपर से चम्पक, बाल भारती, राजकमल की प्रतिनिधि कहानियां, चकमक और न जाने क्या क्या? एकदम बेतरतीब आदमी हैं हिंदी वाले माड़साब।

ये चिट्ठी आपको उनसे बचकर रहने की सलाह के लिए लिखी जा रही है। हम नहीं चाहते हैं कि आप भी उनके चंगुल में फँसो। पहले हम आराम से थे जब वे नहीं थे। उनके आने से काम बढ़ गया है। सुबह स्कूल खोलते ही आईना बाहर रखो, उसमें अपनी शक्ल देखो, बाल संवारो, कक्षा और उसके बाहर का आँगन साफ़ रखो, खुद के कमरे की लाइट और पंखें उपयोग नहीं हो तो बंद करो। डस्टबिन खाली करो, रोज़ का कचरा रोज़ जलाओ। असल में उनके आने से टेंशन और मगजमारी ज़्यादा बढ़ गयी है। हम सीबीआई जांच कराना चाहते हैं कि क्या बीते महीने राज्यभर में लगे सभी हिंदी वाले नए माड़साब इसी टाइप के हैं या हमारी ही किस्मत खराब थी। खैर, कक्षा बारह और ग्यारह में दिनभर में कम से कम तीन-तीन बार पढ़ाने जाते हैं। आप ही बताओ एक ही बोरिंग आदमी को कोई कितनी देर सुने। बोलते हैं तो इतना अच्छा और जानकारीभरा कि हम बड़े चाव से सुनते हैं। हमारे पास कोई चारा नहीं बचता। हमारे माड़साब हैं लेकिन इतना मीठा बोलते हैं कि उनकी शक्ल हमारे बड़े भाई, बड़ी बहन, माँ-पिताजी से मेल खाने लगती है। समझ में ये नहीं आ रहा कि ऐसा करके वे अध्यापकों की बनी बनायी परिपाटी को और मिसालों को तोड़ना क्यों चाहते हैं भला ?

हिंदी साहित्य पढ़ाते हुए सिलेबस से इस कदर बाहर जाते हैं कि हम विद्यार्थी उनके घर-परिवार के हो जाते हैं। वे हमें दुनियादारी, ज़िंदगी, सही रास्ते, चुनाव, विवेक, देश, सत्ता और बेहतर नागरिकता जाने कहाँ-कहाँ ले जाकर वापस किताब में लाकर छोड़ते हैं। बसेड़ा की भोली जनता को इतना घुमाना और गहराई से पढ़ाना अच्छी बात नहीं। टीन एज की फिसलन, करिअर की मुश्किलें, कॉलेज का आकर्षण और हकीक़त, ग्रामीण पिछड़ापन और हमारा समय, टीवी और उसका बाज़ार जैसे दर्जनों विषय उनकी ज़बान पर हर कभी चस्पा अनुभव हुए। कई बार मुद्दे हमारी समझ के बाहर ही साबित हुए। उनके द्वारा सबकुछ समझा देने की उमंग और स्नेह के वे मौके हमें उनके करीब ले जाकर छोड़ते महसूस हुए। एकदम जुदा किस्म के इंसान हैं हिंदी वाले माड़साब। हमें नालायक कहकर पुकारते हैं और खुद को महा-नालायक। कहते हैं सभी को खुद की तरह बिगाड़कर छोड़ेंगे। कभी कभार हँसते हैं, हाँ जब हँसते हैं तो उनका एक अतिरिक्त दांत बड़ा सुन्दर लगता है। वैसे दिल के इतने बुरे भी नहीं है मगर वे कबीर पढ़ाते-पढ़ाते जाने क्यों प्रहलाद सिंह तिपानिया, शुभा मुद्गल, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, कुमार गन्धर्व जैसी संज्ञाएँ उगलने लगते हैं। उनका बस चले तो हमें शबनम विरमानी की निर्देशित तीन फ़िल्में भी दिखा दे। हम डर रहे हैं कि जिस दिन हमारे बसेड़ा स्कूल में म्यूजिक सिस्टम आ जाएगा, माड़साब हमें उनके वरिष्ठ साथी प्रो. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल का दिया हुआ कबीर यात्रा प्रोजेक्ट का ऑडियो संग्रह भी सुनाएंगे ही। कितने बहुधंधी व्यक्ति लगते हैं ये।

आदमी एकदम पागल है साहेब। कबीर के तीन पेज के पाठ को तीस पेज में पढ़ाता है। मुंशी प्रेमचंद और प्रसाद की कहनियों पर बात करता है तो हमारी पाठ्यपुस्तक छोड़कर कोई रामचंद्र तिवारी जी हैं उनकी मोटी किताब 'हिंदी का गद्य साहित्य' और विश्वनाथ त्रिपाठी जी की 'हिंदी साहित्य का सरल इतिहास' और भी जाने क्या-क्या लाकर उनमें से पन्ने उलट-पलट कर पढ़ाते हैं और लिखाते अलग से हैं। बच्चों की जान लेंगे क्या? माड़साब कुछ करना चाहते हैं।  आखिर में हमने भी हार मान ली। उनके हिसाब से चल रहे हैं। अब जो होनी है उसे कौन टाल सकता है। जो लिखा होगा होकर रहेगा। इन माड़साब की स्पीड हमसे रुकेगी तो है नहीं। उन्हें और हमें मंजिल ज़रूर मिलेगी, ऐसा हमें भी लगने लगा है। खैर मगर आप ऐसे खतरनाक माड़साब से बचकर रहिएगा।हम तो जकड़ लिए गए हैं। अब सबकुछ लाइलाज हो गया है।चारों तरफ अन्धेरा है। जिस तरफ से उजाला आ रहा है उसी तरफ हिंदी वाले माड़साब खड़े हैं। एक और बात चलते चलते कि ये जिसे अपना शिष्य बनाकर पढ़ाते और डुबोते हैं तो फिर कहीं का नहीं छोड़ते। हम आपके बचे रहने की कामना करते हैं। आज के लिए इतना ही। नमस्ते।

बसेड़ा के बच्चे।

(बसेड़ा की डायरी,14 जुलाई,2017,लेखक:माणिक)

बुधवार, 12 जुलाई 2017

बसेड़ा में 'हिंदी क्लब'

बसेड़ा में 'हिंदी क्लब'
नए नवेले स्कूल को सूंघने के बाद पता चला पुस्तकालय में नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकों के अलावा पुस्तकालय के नाम पर लगभग खालीपन है। मैं एकदम अवाक और सन्न। यहीं से एक पुराना आइडिया फिर से हिलोरने लगा। उत्तर मेट्रिक तक का संस्थान और लकवाग्रस्त पुस्तकालय। काम की गुंजाईश निकल पड़ी। 'सिलेबस के अलावा सन्दर्भ पुस्तकों और गैर अकादमिक रोचक साहित्य की ज़रूरत ही विद्यार्थियों को बेहतर इंसान में तब्दील कर सकती है' यह विचार कुछ साल पहले अपने वरिष्ठ साथियों की बदौलत ठीक से समझ आ गया था। पिछले साल की अध्यापकी के अनुभव में दुर्ग चित्तौड़गढ़ स्कूल में एक योजना अपनाई और इत्तफाकन बड़ी सफल हुई। आज की डायरी के बहाने बता दूं कि किले के निवासी कक्षा नौ के साथी धीरज सालवी ने किले के बच्चों हेतु एक नि:शुल्क ग्रीष्मकालीन पुस्तकालय संचालित किया और बाईस प्रतिनिधि कहानी संग्रह में से कइयों को भरपूर पढ़वाया भी। इसी सन्डे के अवकाश में पुस्तकों की वापसी पर जब धीरज के घर गया तो पाया कि धीरज और उसके अभिभावक ने बड़े प्रेम से शाम की चाय पिलाई और देर तक इस नवाचारी काम के बारे में बतियाते रहे। धीरज ने मुंशी प्रेमचंद को जी भरकर पढ़ा,साक्षी ने मन्नू भंडारी को तो रीना ने मृद्ला गर्ग को। कोई ऋषिकेश सुलभ को तो कोई राजेंद्र यादव को पढ़कर बहुत खुश था। कई ने एकाध कहानी के बाद किताबें लौटाईं भी मगर हम इस तरह के उदाहरण के लिए तो हम पहले से तैयार थे ही।लाभ लेने वाले बच्चों की एक लम्बी सूची है जो मेरी सेलेरी प्रधान नौकरी का हिस्सा नहीं थी बल्कि मेरे फितुरमंद होने का फल था।
बीच में एक मुलाक़ात के दौरान अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी और हिंदी प्रशिक्षक रमेश शर्मा जी ने भी इसी तरह का एक वाकया सुनाया। रमेश जी ने तेल के कुछ खाली डिब्बा ले ढक्कन लगाकर कनस्तर बना लिए। फिर कुछ चयनित बीसेक पत्र-पत्रिकाएँ ली और गाँव के एक सक्रीय बच्चे को दे आए, कहा अगले पखवाड़े आउंगा तब तक आपस में बांटकर पढ़ो। इसी तरह अपनी घुमक्कड़ी में एक दूजा कनस्तर किसी तीजे गाँव में दे आए। शहर से हमेशा मासिक पत्रिकाएँ ले आते और इस तरह बाल पत्रिकाओं का भी एक अच्छा कलेक्शन कर लिया। रमेश जी बड़े सहज और गंभीरता के साथ एक्टिविस्ट की भूमिका अदा करने वाले साथी हैं। वे इस आयाम को सफल करने में लगे रहे। परिणाम भी सुखद ही रहे। वे पंद्रह दिन बाद जाते एक गाँव के डिब्बे में दूजी बीस किताबें रख पुराणी किताबें बदलकर किसी तीजे या चौथे गाँव वाले कनस्तर में छोड़ आते। चलते फिरते पुस्तकालय के ये संस्करण मुझे बड़े रुचे। गाँव के बच्चे पखवाड़ा ख़त्म होते ही रमेश जी और नयी किताबों का इंतज़ार करते। रमेश जी बताते हैं कि यह उनके जीवन का बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था। अब शायद वे बच्चे बड़े हो गए होंगे मगर वे यह कभी नहीं कहेंगे कि हमने अपने बचपन में पत्र-पत्रिकाएँ और गैर सिलेबस प्रधान पुस्तकें नहीं पढ़ी।
ऐसे प्रयोग कोई हम ही कर रहे हों ऐसा नहीं है देश में ऐसा कई जगह हो रहा होगा। ऐसा करके हमने कोई कीर्तिमान रच लिया होगा ऐसी किसी भी गलतफहमी से हम कोसों दूर के आदमी है। हमें अपनी ज़मीन और आकाश की ऊंचाई हमेशा मालुम रहती है तो गिरने का डर नहीं सताता। खैर काम होना चाहिए क्योंकि बालपन से ही पाठकीयता को लेकर गंभीर प्रयास करने की आज बेहद ज़रूरत भी है। हाँ तो बसेड़ा में आज हमने अनौपचारिक रूप से 'हिंदी क्लब' बनाया और उसमें सबसे पहले कक्षा ग्यारह और बारह के बच्चों को कहानियों की पुस्तकें पढने के लिए प्लान की। एक युवा चेनराम को पुस्तकें थमाई और जिम्मा भी सौंपा।कक्षा में एकदम वंचित और उपेक्षित चेनराम के लिए यह अवसर उसमें जान फूँक गया। चेनराम ने जीवन में कभी सोचा नहीं था कि ऐसा अकादमिक काम भी उसे सम्भलाया जा सकता है। वो,मैं और बच्चे नयी पुस्तकों के पन्ने पलटने में मशगूल हो गए। सभी पच्चीस विद्यार्थियों को आज गुरु पूर्णिमा के भाषण की घुटकी के साथ ही एक-एक संग्रह थमा दिए। एक सप्ताह एक संग्रह के लिए तय किया गया। अगले सोमवार 'हिंदी क्लब' की अगली संगत होगी। पुस्तक लेनदेन, हिसाब वगैरह सब चेनराम देखेगा। सावन के सोमवार का ऐसा हिन्दीकरण विद्यार्थियों ने पहली मर्तबा देखा था। देहात के ये बच्चे ऐसी अनौखी पुस्तकें आँखें फाड़ फाड़कर देख और समझ रहे थे। मेरे लिए यह किसी ज्ञानपीठ की-सी खुशी से कम नहीं था।जल्दी ही मैं यहाँ के पुस्तकालय के लिए आप सभी पाठकों से किताबें उपहार में मांगूंगा। कहीं जाइएगा नहीं। कामना है कि सभी पिछड़े इलाके के बच्चों तक 'हिंदी क्लब' की ये अवधारणा कमोबेश फेरबदल के साथ पहुंचे,भले ही माध्यम कोई भी हमविचार साथी हों।नमस्कार,आप में से कोई साथी कक्षा एक से बारहवीं तक के बच्चों हेतु बाल पत्रिकाओं के सालभर पुराने अंक या पढ़ी हुई पुस्तकें या फिर नयी पुस्तकें और नए अंक भेजना चाहें उनका स्वागत है.किताबें इस पते पर भेजें......हम उन्हें बसेड़ा के बच्चों तक वितरित करेंगे.माणिक ,ए -10,कुम्भा नगर, स्कीम नम्बर-6,चित्तौड़गढ़-312001,राजस्थान.


(बसेड़ा की डायरी, 10 जुलाई 2017)

माफ़ीनामा

माफीनामा
नमस्ते,माफ़ करना विद्यार्थियो।हम गुरु नहीं सिर्फ मास्टर हैं।गुरु हो जाना बहुत बड़ा मसला है अभी तो हम अध्यापक होने के कगार पर हैं।जब तक हम समय,समाज और देशकाल की ज़रूरत के मुताबिक़ आज की युवतर पीढ़ी को ठीक से समझकर भविष्य की खातिर उसे तैयार नहीं करते तब तक मास्टर ही रहेंगे। गुरु नहीं बन पाएंगे।हमें मालुम है कि आप हमारी सच्चाइयां जानते हो।बस बोलते नहीं हो,यह आप लोगों की भलमनसाहत है।एक आहट हम समझ चुके हैं कि हमें अब सेलेरी केद्रित जीवन के खांचे से बाहर आना होगा।अब भी जान लें तो बेहतर ही होगा कि बोनस केन्द्रित विमर्श से बाहर भी जीवन है।वेतन आयोग के गणित के अलावा भी हमारी भागीदारी है जो समाज को बनाती और बिगाड़ती है।केवल अखबार पढ़कर अध्यापकी का 'धंधा' चला लेने वाले समझ लें क्योंकि अब समय वैसा नहीं रहा।कमज़ोर से कमज़ोर बच्चा भी थाह लेता है कि आज माड़साब बिना तैयारी के कक्षा में घूस गए।प्लाट/बिल्डिंग बेचने और शेयर मार्केट में व्यस्त रहने की तरह अध्ययन-अध्यापन धंधा नहीं है।

सबसे बड़ी बात 'अध्यापक' होना पार्ट टाइम नौकरी तो कम से कम नहीं ही है।अफ़सोस इन सालों में विद्यार्थियों से ज्यादा माड़साब को 'संजीव' और 'एक्सीलेंट' की ज़रूरत पड़ने लगी है।बेचारे टीचर्स का क्या होता? अगर संजीव भाई और एक्सीलेंट बाबा नहीं होते।पाठ्यक्रम में लगी पुस्तकों के अलावा सन्दर्भ किताबें पढ़ना तो दूर उनके टाइटल तक याद नहीं है।सिलेबस के अलावा किताबें कब पढ़ी ठीक याद नहीं है।बुजुर्ग होने के साथ ही अब सबकुछ बूढा गया है।माफ़ करना बच्चों हम आपकी ज़रूरत के मुताबिक़ अपडेट नहीं हैं।हमें मालुम है कि हम वक़्त के साथ वेतन और उम्र में सीनियर होते जाते हैं अनुभव में भी मगर जानकारियों के लिहाज से खाली और उथले।कभी माफ़ कर सकोगे क्या कि हमने आपके लिए सीमाओं से बाहर जाकर कोई गतिविधि प्लान ही नहीं की।हम सिर्फ आए हुए सरकारी आदेशों को निबटाने में ही ख़त्म होते रहे।हमें मालुम है कि रिटायरमेंट के बाद तुम हमें नमस्ते नहीं करोगे क्योंकि हमें अपने काम की उष्मा का स्तर मालुम है।

यह सभी गैर जिम्मेदार अध्यापकों की तरफ से आपको लिखा जा रहा एक माफीनामा है जिसे लिखने में मैं सबसे आगे हूँ।अगर माफ़ कर सको तो देख लेना कि मैं आपको पढ़ाया जाने वाला पाठ सीधे कक्षा में आने के बाद ही देख पाता रहा हूँ।पाठ के रेफरेंस में बनी फिल्म,किसी पुस्तक में आयी समीक्षा,पत्रिका में आया साक्षात्कार,कवि और लेखक से सजीव सम्पर्क की यादें जैसा कुछ भी खंगाल नहीं पाता मैं। मुझे नहीं मालुम मैंने आखिरी बार न्यूज पेपर के अलावा कौनसी साहित्यिक पत्रिका कब खरीदी और पढ़ी थी? ये भी याद नहीं रहा कि कब किसी साहित्यिक सेमीनार में गया और किसी जानकार से संवाद स्थापित किया।बच्चों मुझे माफ़ करना कि मेरे लिए स्कूल आना और जाना सिर्फ वेतन प्राप्ति का साधन मात्र है।माफी इस बात की भी कि मैंने कभी ये नहीं पता लगाया कि कौनसे बच्चे के माँ बाप कौन हैं? और उनके परिवार की मौजूदा स्थितियां कैसी है जो इसकी पढ़ाई को इफेक्ट करती है? मेरे पास डेली-अप-डाउन के चक्कर में इतना वक़्त नहीं है कि मैं गाँव में जाकर अभिभावकों से चर्चा कर सकूं।

भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का स्थान एक बड़े गंभीर अवसर के रूप में स्थापित है मगर क्या करें इन दशकों में ऐसे गुरु अब लुप्त:प्राय प्रजाति घोषित हो चुके हैं।ये वक़्त बड़ा कातिल है।समय आ गया है जब हम अध्यापकों को जो खासकर सरकारी संस्थानों में 'सेलेरी केन्द्रित' और 'वेतन आयोग केन्द्रित' समय बीता रहे हैं को अपने पड़त हो चुके चोलेे को उतार कुछ नया रचना होगा।हम नागनाथों के लिए ये केंचुली उतारने का समय है।मिलते हैं अगली गुरु पूर्णिमा पर। हो सकता है तब तक हम गुरु बन सकेंं।फिलहाल मैं अध्यापक हूँ।गुरु बन सका तो खुद ही दूसरा खत लिखूंगा।इसे अपने संवाद का पहला ख़त समझना।


(बसेड़ा की डायरी-9 जुलाई,2017)

स्कूल से दोस्ती

नमस्कार,आपकी शुभकामनाओं और सहयोग से मेरा स्कूल व्याख्याता (हिंदी)पद पर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बसेड़ा,तहसील छोटीसादड़ी,ज़िला प्रतापगढ़ पर पोस्टिंग हुआ है जो चित्तौड़गढ़ से प्रतापगढ़ हाई वे पर बाड़ी गांव से ठीक बाद है इस तरह चित्तौड़ से कुल 45 किलोमीटर दूर स्थित है।इस बाबत जब भी स्नेहभोज का आयोजन होगा आपको याद करेंगे।अनुग्रह बनाए रखिएगा।आदर सहित माणिक,चित्तौड़गढ़।

दस मिनट की अनौपचारिक विदाई में कुल जमा पच्चीस बच्चों के बीच तीन वाक्य भी नहीं बोल पाया कि रो पड़ा.अब औपचारिक विदाई का सामना मैं नहीं कर सकूंगा.प्लीज मेरा लिखा हुआ भाषण पढ़ा जाए तो बेहतर है.विदाई में पहनाई माला घर ले आया.वहां के साथियों की तरह फूल बड़े खुशबूदार थे

रोज़ाना पचास किलोमीटर जाना और फिर आना,इसके बाद एक आदमी के भीतर का 'एक्टिविस्ट' दम तोड़ने लगता है.(आतमज्ञान)

एक साथ खुद के सिंगल-सिंगल चारेक दर्ज़न फोटो खिंचवाना और आधा दर्ज़न माला पहनना खुद को असहज करने का सबसे आसान तरीका है.(आतमज्ञान)

अनुष्का आज मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' का विडियो रूपांतरण देख रही है।कल उसने चिल्ड्रन फ़िल्म सोसायटी ऑफ इंडिया की फ़िल्म 'सुल्तान की कुकडू कू' देखी(अनौपचारिक शिक्षा जारी आहे) बाकी टीवी तो बंद है यह ख़बर अब पुरानी हो गयी है।

कक्षा 11 और 12 के कुल जमा एक दर्जन विद्यार्थी।अनौपचारिक बातचीत।चित्रा मुद्गल जी की कहानी 'जगदम्बा बाबू गांव आ रहे हैं' का पाठ किया।अद्भुत कहन।देसज अंदाज।लोक की खुशबू।राजनीति का दोहरा चरित्र।ममतामयी सुख्खन भौजी।सरकारी तंत्र की पोल पट्टी।पहले ही दिन वो किया जो सिलेबस में नहीं है।पासबुकों और पुस्तकों की रेस में पासबुकें फिर जीत गयीं.पुस्तकें अभी तक आयी नहीं मगर पासबुकें मंझिल तक पहुँच गयी हैं.पुस्तकें आजकल बेवफा होने लगी है.(आप बाज़ार के अधबीच हैं)(बसेड़ा की डायरी-0)

सूचनार्थ:सवेरे आठ से दोपहर दो बजे तक मैं स्कूल में रहता हूँ.यथासंभव मुझे इस दौरान फ़ोन नहीं करेंगे तो मैं और मेरे विद्यार्थी आपके आभारी रहेंगे.बाकी अतिआवश्यक परिस्थितियों में कॉल कर लीजिएगा.वैसे जानकारी के लिए बता दूं स्कूल परिसर में मेरे फोन पर किसी भी तरह के नेटवर्क और इन्टरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं रहती है.........आज अपने स्टाफ साथियों के साथ लम्बी बैठक हुई. योजनाएं कोंपलों की तरह फूटने लगी है.जल्दी ही रिजल्ट आएँगे तो आपके साथ फोटो आदि शेयर करूंगा ही.शुक्रिया

आगे बढ़ने के तीन नारे जो आज मैं विद्यार्थियों को सौंपने जा रहा हूँ।इनमें नारा लगाने वाली लय मत ढूंढिएगा।ये एक वंचित क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने की अलख है। 1-मेरा स्कूल मेरा घर है। 2-हमारा स्कूल सबसे आगे। 3-सबसे अच्छा स्कूल हमारा।

सूचनार्थ:सत्रह में से सात पद खाली है.प्रिंसिपल नहीं है.बाबू नहीं है.चपरासी तो है ही नहीं. तीनों भाषाओं के तीन सेकण्ड ग्रेड अध्यापक के पद खाली है.एक लेवल टू अध्यापक का पद भी खाली है.मतलब आप समझ रहे हैं कि एक आदमी दो काम कैसे कर रहा होगा.जो व्याख्याता भरेपूरे स्टाफ के साथ अध्यापनरत हैं उन्हें यहाँ हम वंचित क्षेत्र के और कम मानव संसाधन वालों के कठिन समय में हम व्याख्याताओं पर टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं हैं.हम खाली का रोना रोने के बजाय मिले हुए संसाधनों के बीच बेहतर करने के पक्ष में हैं.राजस्थान सरकार अपने स्तर पर सतत प्रयास कर ही रही है कि डीपीसी लगातार हो और बाकी खाली पद भी भरे जा सके. पद भी जल्दी ही भरेंगे मगर फिलहाल का सच यही है कि पद खाली हैं.हम एक ऐसे इलाके में अध्यापन का काम देख रहे हैं जहां लोग देश के लोकप्रिय प्रधान मंत्री जी तक का नाम नहीं जानते हैं.आप समझ सकते हैं कितना मुश्किल काम है. इसी से अंदाजा लगा लीजिएगा कि जनरल नॉलेज पर कितना काम करने की ज़रूरत है.

हमारा स्कूल हमारा घर है।इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी है।हम किसी के भरोसे नहीं हैं।कुछ मिला तो वो हमारे लिए बोनस या ईनाम माना जाए।हम अपने माता पिता सहित हमारे सरकारी स्कूल की कायाकल्प करना चाहतीं हैं।हमें बताया भी गया और अब हम समझ गए हैं कि किताबी ज्ञान के अलावा भी टीम भावना और सामाजिकता जैसे कई पाठ हमें हमारा स्कूल परिवेश ही सिखाता है।

योग भगाए रोग।शारीरिक शिक्षक श्री नंदकिशोर दुबे जी के निर्देशन में प्रार्थना में रोज़ाना की ज़रूरी गतिविधि प्राणायाम और ध्यान।मैंने इसमें तानपुरे की धुन जोड़ दी है।अभी मोबाइल से चलाता हूँ।कुछ दिन में एक साउंड सिस्टम प्लान करेंगे।मैं स्कूल में बीते एक साल से एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ जिसका नाम है 'म्यूजिक इन द स्कूल'। जल्दी ही पूरी जानकारी साझा करूँगा।

इन दिनों की दिनचर्या से एकदम संकड़ाई में आ गया हूँ।वक़्त लगभग नहीं मिलता है।बीते सालों की फ़ुरसत बहुत याद आती है।कई नए कार्यालयी काम सिख रहा हूँ।सेकंडरी स्कूल दुर्ग का एक साल का अनुभव बड़ा काम आ रहा है।आजकल सवेरे पाँच बजे का उठा छह से आठ बजे तक रोडवेज का सफर तय करके बसेड़ा स्कूल पहुँचता हूँ।स्कूल जाने के बाद हिंदी और 'हिंदी की बिंदी' में कब दो बज जाते हैं मुझे पता नहीं चलता है।खैर मैं यह साझा करना चाहता हूँ कि सवेरे यात्रा के दौरान एक घण्टा शास्त्रीय संगीत सुनकर सार्थक करता हूँ।बाकी के साठ मिनट किताब पढ़ने में।आजकल 'कँवल भारती जी' को पढ़ रहा हूँ।क्या गज़ब की व्याख्या के साथ इस पुस्तक :दलित विमर्श की भूमिका' को रचा है।स्कूल में आदत के मुताबिक पाठ्यक्रम के साथ साथ गैर अकादमिक शिक्षा यानी 'जीवन का गणित' पढ़ा रहा हूँ।आते वक्त इतना थक जाता हूँ कि पूरे सफर बस में सोने की इच्छा रहती है।

सरकारी स्कूल अक्सर एक सरीखी खुशबू वाले होते हैं मगर उन्हें सतरंगा अगर कोई बनाता है तो वहां का स्टाफ।बेहतरी की गुंजाईश हमेशा बालमना विद्यार्थियों में ही बची रहती है।साथी और बुजुर्ग-मन वाले जड़ अध्यापकों में सुधार और ओरियंटेशन की संभावना एकदम ज़ीरो मानकर चलें।देहात के बच्चों के बीच काम करना ज्यादा सुविधाजनक और परिणामदायक अनुभव हुआ।अध्यापकी के बीते सत्रह साल के जीवन में मैंने पंद्रह साल सरकारी स्कूलों में अध्यापन (मेरे अनुसार अध्यापन का अर्थ नौकरी नहीं है।)करते हुए दर्जनों प्रयोग किए।आज भी जारी है।मैं कई मोर्चों पर सक्रिय रहा हूँ और उन सभी संगतों का निचोड़ अब स्कूली शिक्षा और इन विद्यार्थियों के बीच सार्थक करना चाहता हूँ।सिलेबस से बाहर जाने की मेरी आदत बदस्तूर जारी है।वैसे भी गाँव के स्कूल के बच्चे इस दुनियादारी के गणित को समझने में बहुत ज़्यादा पीछे हैं तो हमारी जिम्मेदारी अपने आप कुछ अतिरिक्त हो जाती है।मेरे अतीत का बहुतेरा हिस्सा गाँव ने ही घेर रखा है।सैंतीस की उम्र में बीस साल पर गाँव और बाकी पर शहरी आबोहवा का कब्जा है।फिर भी बताता चलूं कि कुलजमा मैं शहर की पकड़ और जकड़ से दूर रहना चाहता हूँ।वक़्त कम है काम ज़्यादा।एकाग्रता बलिदान मांगती है।कुछ गंभीर और गहरा काम करने के लिए अब आकाशवाणी,स्पिक मैके,आरोहण,फ़िल्म सोसायटी,आर्ट सोसायटी में उतना समय और विचार नहीं दे पाता।बसेड़ा स्कूल के बच्चे और गांव के अभिभावक धीरे धीरे मेरे दिल के पास आ रहे हैं।


7 जुलाई 2017

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