संस्कृतिकर्मी माणिक बंगलुरु में साझा करेंगे अपने नवाचार

बसेड़ा से माड़साब  चुने गए  इंटरनेशनल कोंफ्रेंस में पैनलिस्ट   संस्कृतिकर्मी माणिक बंगलुरु  में साझा करेंगे अपने नवाचार  ---------...

गुरुवार, 29 मार्च 2018

बसेड़ा की डायरी-10 (जगदीश जी माड़साब)


बसेड़ा की डायरी-10 (जगदीश जी माड़साब)

आज परिचय करवा रहा हूँ हमारे स्कूल के लगभग सबसे बुज़ुर्ग जगदीश जी सर से। बाकी दिल और दिमाग से एकदम जवान। सामाजिक पढ़ाते हैं और भूगोल में स्नातकोत्तर हैं। लेक्चरर बनने और पीएचडी करने की उनकी तमन्ना उनकी बातों में अक्सर झलक जाती है। अपने अपियरेन्स से एकदम बच्चे के माफिक पेश आते हैं। नीमच के रहने वाले हैं। बोलते ज्यादा हैं। अक्सर अपने अतीत में खोए रहकर नॉस्टैल्जिक बातें करते हैं। भाभी जी कोर्ट में रीडर जैसी कुछ हैं। एक बेटा और एक बेटी है। उनकी बातों में परिवार के किस्से भी यदाकदा आवाजाही कर ही लेते हैं। अपनी बीती हुई तीस साल की नौकरी के सैंकड़ों किस्से उनकी ज़बान पर एकदम तैयार और चस्पा हैं। कभी कभार ही कबुलते हैं कि उनका रिटायरमेंट करीब है। कभी जेके स्कूल निम्बाहेड़ा तो कभी जलोदा केलुखेड़ा और सुबी आदि गांवों के नाम की संज्ञाएँ दुहराते रहते हैं। कभी कभी आप डेळ(ढीले) रह जाओ तो आपकी तरफ का भी वे बोल जाते हैं इतना बोलते हैं। जब थक हार जाते हैं तो कहने लगते हैं अरे यार मेरा तो बायपास सर्जरी हो रखा है मैं हार्ट पेशेंट हूँ वगैरह-वगैरह। अपनी आदत के मुताबिक़ कुछ महीनों पहले उन्हें गिजुभाई की लिखी कई किताबों में से एक महत्त्वपूर्ण 'दिवास्वप्न' पढ़ने दी। यह पुस्तक बसेड़ा के चारेक अध्यापकों को दे चुका हूँ। पुस्तक का असर कई बार उनकी अध्यापकी में देख चुका था मगर आज एक अनुभूति के बहाने लिख रहा हूँ। बाकी दो अध्यापकों पर भी उस पुस्तक का असर हुआ ही है उन पर कभी अवसर मिला तो लिखूंगा ही।

बसेड़ा में अध्यापक साथी जगदीश जी सेंगर का अद्भुत प्रयोग। गिजुभाई बधेका का 'दिवास्वप्न' रंग ला रहा है। उन्होंने आज न केवल बच्चे को नहलाया बल्कि उसके कपड़े भी धोकर दिए। यह सबकुछ सिम्बोलिक था, आप भी जानते हैं इसका असर बाकी बच्चों पर होगा ही। सेंगर जी के कई नारे ऐसे हैं जो अब स्कूल की चार दीवारी में गूंजने लगे हैं। गोया 'एक दो तीन चार,बच्चों बनो होशियार' इसी तरह 'कागज़ मती फाड़ो,कागज़ मती फाड़ो'। कुलजमा मस्त इंसान हैं जगदीश जी। एकदम दिलफैंक। लंच में अपने घर से लाई सब्जी इतनी आत्मीयता से सभी को परोसकर भोजन शुरू करते हैं कि घर की-सी अनुभूति हो जाती है। अध्यापकों में प्रशासन और प्रबंधन के लिए विभिन ग्रेड बना रखी है बाक़ी हैं सभी अध्यापक ही। सेंगर जी जैसे हो वैसे ही बने रहो। आपके इस अंदाज़ से हार्ट अटक और बाक़ी बीमारियाँ अपने आप दूर ही रहेंगी। पहली और दूसरी के बच्चों के चेहरे पर आपकी वजह से आई मुस्कराहटें आपको कभी बीमार नहीं पड़ने देगी,यह मेरा दावा है। स्कूल परिसर में आपकी आवाज़ और हरकतें(प्रयोग) एकदम बुलंद है। काश हम समझ सकें कि इन बाल देवताओं की वजह से ही हमारा घर चल रहा है।

फिर मुझे लगा 'एक अध्यापक ही है जो समाज को बदल सकता है' जैसे वाक्य यहाँ सच हो रहे हैं। हाँ अध्यापकों के लिए बस 'दिवास्वप्न' के गंभीर पाठ की ज़रूरत है। हाँ तो मैं आज स्कूल में एक बच्चे को नहलाने के प्रयोग पर आता हूँ। सभी दर्शक इस पूरी प्रक्रिया को एक 'पागल माड़साब की हरक़त' की मानिंद देखते रहे। अरे याद आया, उनकी तबियत के मुताबिक ही हमने इस गणतंत्र दिवस पर प्राइमरी के बच्चों के साथ उनका ‘आशीवार्द’ फ़िल्म के उस रेलगाड़ी शीर्षक वाले गीत पर अभिनय भी रखा था जिसे अशोक कुमार पर फिल्माया गया था। क्या मस्त काम किया था उस रोज़ सेंगर जी ने। असली बात यह है कि जगदीश जी सिरफिरे हैं। अब वे जान गए थे कि वे सही रास्ते पर हैं। वे अपनी धुन के पक्के हैं क्योंकि उनके कॉन्सेप्ट क्लियर हैं। के कहते हैं कि ऐसे प्रयोग वे सालों से करते रहे हैं मगर अब उन्हें गिजुभाई का आधार मिल गया है।

हाँ कभी कभार ज्यादा बोल जाते हैं मगर दिल उनका साफ है। आप जादू देखें कि इस नवाचार के दूजे दिन सालों से गंदे आ रहे बच्चे चमचमाट नज़र आए। साहेब, प्रयोग साहस मांगता है। तयशुदा ढर्रे से अलग जाने के लिए बेशर्म होना पड़ता है। असल में हम ढर्रे के इतने आदि हो गए हैं कि अब 'सभ्य' कहलाने लगे हैं। फिर जगदीश भाई जैसी असभ्यता कहां से लाएं। सेंगर जी सलाम है आपको। आप अपनी बची हुई नौकरी में अब बच्चों के और ज्यादा करीब आ रहे हो क्योंकि आप बच्चों को पढ़ाते समय अपना रुतबा ताक में रखकर उनके साथ ज़मीन पर बैठना स्वीकारते हो। आपको अलॉट की हुई कक्षाएं एकदम दूजी है मगर आप यदाकदा प्राथमिक कक्षाओं की तरफ खिंचे चले जाते हो क्योंकि आपके भीतर एक बच्चा गुलांटियां खाता रहता है। स्कूल में साफ-सफाई से लेकर पौधों को पानी देने तक के काम में आपका तल्लीन होकर लगे रहना और अपनी बीपी और हार्ट पेशेंट की भूमिका के प्रति बेपरवाही लाज़वाब है। आपको हमने स्कूल में गेंती, फावड़े चलाते देखा है, आँगन साफ़ करने में गोबर तक उठाते आप शर्म नहीं करते हैं। पीने के पानी के इंतज़ाम में आपने कई जगह ईंट-पत्थर और चुनाई तक काम किया है। एकाध बार की ही बात जब मैंने आपको भयंकर गुस्से में देखा बाकी अमूमन आप बेफिक्र ही नज़र आए। एक निवेदन है गिजुभाई की कुछ किताबें अध्यापकों को बांटने के लिए खरीद लीजिएगा क्योंकि यह खुशबू जितनी फैले उतना अच्छा। हाँ बेटी की शादी के लिए अग्रिम शुभकामनाएं। आपका कर्म और दिल अच्छा है इसलिए आपके साथ कभी बुरा नहीं होगा। बसेड़ा स्कूल के नन्हें नौनिहाल आपके कर्जदार रहेंगे।

बसेड़ा की डायरी https://gsssbaseda.blogspot.com/
लेखक:माणिक

बुधवार, 21 मार्च 2018

गुरु-चेले के रिश्ते(गुणवंत)

गुरु-चेले के रिश्ते
----------------------------
आज बारहवीं के स्टूडेंट साथी गुणवंत के बुलावे पर उसके खेत पर गए और उसके परिवार के साथ वक़्त बिताया। मैं,प्रधानाचार्य प्रभु दयाल जी और इतिहास के साथी व्याख्याता प्रेमाराम जी।बच्चा, खेत के ठीक पास सड़क पर हमारे आने की राह में देर से खड़ा था। उसकी उत्सुकता सिर्फ कोई स्टूडेंट ही समझ सकता है। उसके माता-पिता को मालुम था कि गुरूजी शाम को स्कूल की छूट्टी के बाद आएँगे फिर भी वे सुबह से इंतज़ार कर रहे थे। यह भाव ऐसे अभिभावक ही समझ सकते हैं जो भीतर से आल्हादित और भावुक भी हों। उन्होंने नया चूल्हा बनाया और उसे लीपा। पड़ौस के बगीचे से संतरे मांग लाए। बाज़ार से वो दो तरह की नमकीन ले आ चुका था। जाते ही उसके पिताजी खेत से ताज़ा प्याज तोड़ लाए और क़तर कर नमकीन में मिला दिए। मनुहार पर मनुहार। घर-परिवार की तमाम बातें। नुवार वाले पलंग पर गुणवंत के पिताजी दसों बार कहे के बाद भी नहीं बैठे। हम तीनों गुरूजी को बिठाकर ही तसल्ली भोगते दिखे। माँ ठंडा पानी ले आई। तीलियाँ ख़त्म हो गयी और चुल्हा न जला तो गुणवंत बाइक पर कहीं जा नई माचीस ले आया। चूल्हा जला,पतीली चढ़ी,चाय रखी गयी।

इधर हम संतरे छीलकर खाते रहे। नमकीन भी कुछ वक़्त बाद ख़त्म हो ही गयी। रिश्ते प्रगाढ़ हो रहे थे। गुणवंत के पापा 'मालिक-मालिक' के तकिया कलाम के साथ पेश आते रहे। मुझे मालूम है हमारा इस तरह जाना गुणवंत को जीवनभर याद रहेगा। हम बाक़ी गुरुजन की तरह अपनी फितरत के अनुसार भूल जाएंगे। यही सच है।काश यह झूठ निकल जाए।गुणवंत इस पूरे संवाद में लगभग चुप रहा। इस बीच उसका छुटका भाई विक्रम आ गया।उसने भी बची हुई परोसकारी में हाथ बटाया। अंत में विदा ली तो हमने एक सेल्फी का प्रस्ताव रखा। कैमरे की फ्रेम से गुणवंत और उसके पिताजी दूर ही खड़े रहे। जबकि आज के चीफ गेस्ट वे दोनों ही थे। मेरे दो बार कहे पर वे फ्रेम में आए और सेल्फी पूरी हुई। अंत में उन्होंने बचे हुए संतरे के साथ कुछ लहसुन और बोरड़ी के बोर(बेर) हमारे साथ बाँध दिए ताकि घर ले जा सकें। कुछ देर मेड़ पर चलकर हम सड़क तक आए। सड़क तक गुणवंत छोड़ने आया। आज लगा गुणवंत हमारे दिल के और करीब आ गया है। हम भी जानबुझकर उसके एक कहे पर चले गए। एक बात कहें, आज गुणवंत को रात में नई तरह की उमंग अनुभव होगी और सपने तो खैर जुदा किस्म के ही देखेगा......हम अपनी स्कूल के सभी दो सौ ग्यारह 'गुणवंत'/'गुणवंती' के घर जाकर यह सम्मान उनके अभिभावक को देना चाहते हैं।कभी तो आस पूरी होगी। मगर शर्त यह है कि सभी स्टूडेंट पहले 'गुणवंत' बने। और सभी अभिभावक 'गुणवंत के माँ-पिताजी'।

माणिक

सोमवार, 19 मार्च 2018

बसेड़ा स्कूल में होली उत्सव





सन्डे लाइब्रेरी अपडेट्स







जब बसेड़ा के किशन भील को मिला लेपटोप


नशा मुक्ति अभियान





बोर्ड परीक्षार्थियों का विदाई समारोह 2018













जब बसेड़ा आए हिंदी के जानकार डॉ. राजेश चौधरी जी
















बसेड़ा में परिंडे बांधो,पक्षी बचाओ अभियान

























यह ब्लॉग खोजें

Follow by Email