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बुधवार, 21 मार्च 2018

गुरु-चेले के रिश्ते(गुणवंत)

गुरु-चेले के रिश्ते
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आज बारहवीं के स्टूडेंट साथी गुणवंत के बुलावे पर उसके खेत पर गए और उसके परिवार के साथ वक़्त बिताया। मैं,प्रधानाचार्य प्रभु दयाल जी और इतिहास के साथी व्याख्याता प्रेमाराम जी।बच्चा, खेत के ठीक पास सड़क पर हमारे आने की राह में देर से खड़ा था। उसकी उत्सुकता सिर्फ कोई स्टूडेंट ही समझ सकता है। उसके माता-पिता को मालुम था कि गुरूजी शाम को स्कूल की छूट्टी के बाद आएँगे फिर भी वे सुबह से इंतज़ार कर रहे थे। यह भाव ऐसे अभिभावक ही समझ सकते हैं जो भीतर से आल्हादित और भावुक भी हों। उन्होंने नया चूल्हा बनाया और उसे लीपा। पड़ौस के बगीचे से संतरे मांग लाए। बाज़ार से वो दो तरह की नमकीन ले आ चुका था। जाते ही उसके पिताजी खेत से ताज़ा प्याज तोड़ लाए और क़तर कर नमकीन में मिला दिए। मनुहार पर मनुहार। घर-परिवार की तमाम बातें। नुवार वाले पलंग पर गुणवंत के पिताजी दसों बार कहे के बाद भी नहीं बैठे। हम तीनों गुरूजी को बिठाकर ही तसल्ली भोगते दिखे। माँ ठंडा पानी ले आई। तीलियाँ ख़त्म हो गयी और चुल्हा न जला तो गुणवंत बाइक पर कहीं जा नई माचीस ले आया। चूल्हा जला,पतीली चढ़ी,चाय रखी गयी।

इधर हम संतरे छीलकर खाते रहे। नमकीन भी कुछ वक़्त बाद ख़त्म हो ही गयी। रिश्ते प्रगाढ़ हो रहे थे। गुणवंत के पापा 'मालिक-मालिक' के तकिया कलाम के साथ पेश आते रहे। मुझे मालूम है हमारा इस तरह जाना गुणवंत को जीवनभर याद रहेगा। हम बाक़ी गुरुजन की तरह अपनी फितरत के अनुसार भूल जाएंगे। यही सच है।काश यह झूठ निकल जाए।गुणवंत इस पूरे संवाद में लगभग चुप रहा। इस बीच उसका छुटका भाई विक्रम आ गया।उसने भी बची हुई परोसकारी में हाथ बटाया। अंत में विदा ली तो हमने एक सेल्फी का प्रस्ताव रखा। कैमरे की फ्रेम से गुणवंत और उसके पिताजी दूर ही खड़े रहे। जबकि आज के चीफ गेस्ट वे दोनों ही थे। मेरे दो बार कहे पर वे फ्रेम में आए और सेल्फी पूरी हुई। अंत में उन्होंने बचे हुए संतरे के साथ कुछ लहसुन और बोरड़ी के बोर(बेर) हमारे साथ बाँध दिए ताकि घर ले जा सकें। कुछ देर मेड़ पर चलकर हम सड़क तक आए। सड़क तक गुणवंत छोड़ने आया। आज लगा गुणवंत हमारे दिल के और करीब आ गया है। हम भी जानबुझकर उसके एक कहे पर चले गए। एक बात कहें, आज गुणवंत को रात में नई तरह की उमंग अनुभव होगी और सपने तो खैर जुदा किस्म के ही देखेगा......हम अपनी स्कूल के सभी दो सौ ग्यारह 'गुणवंत'/'गुणवंती' के घर जाकर यह सम्मान उनके अभिभावक को देना चाहते हैं।कभी तो आस पूरी होगी। मगर शर्त यह है कि सभी स्टूडेंट पहले 'गुणवंत' बने। और सभी अभिभावक 'गुणवंत के माँ-पिताजी'।

माणिक

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